मनुष्य का जन्म
कुल-विशेष लक्षणों तथा प्राकृतिक क्षमताओं के साथ होता है
जो कि उन्हें जानवरों से पृथक करता है। रेयूकाई का मानना
है कि इस प्राकृतिक क्षमता को उच्चतम सम्भावित स्तर तक
चमकाना तथा विकसित करना चाहिये। रचनात्मक रूप से सोचने की
क्षमता तथा स्वयं की अनुभूति से भी आगे के संसार के बारे
में तथा नए विचारों की कल्पना करना केवल मनुष्य का ही
लक्षण है। रेयूकाई का विश्वास है कि इस योग्यता का उपयोग
ना करके मनुष्य अपनी क्षमताओं को व्यर्थ करता है तथा
प्रत्येक मनुष्य की दिनचर्या जैसे -
सोना, खाना, काम करना,
खेलना आदि को चेतना की शक्ति से उत्तेजित करने को
प्रोत्साहित करता है, जिससे वह अपनी क्षमताओं का विकास कर
अपनी सामर्थ्य का पूरा लाभ प्राप्त कर सके। इस प्रकार के
कार्य तथा चेतना से ही सही अर्थ में मनुष्य होने के सार
तत्व का संग्रह कर पायेंगे। अपनी सहृदयता, रचनात्मकता तथा
ज्ञान का विकास करके ही हम एक सहृदय विश्व का निर्माण करने
में समर्थ होंगे।
|