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श्री दहिया जब भी फ़तेहगढ़ आते, तब स्थानीय क्षेत्र में लोगों को सदस्य बनाते।
सदस्य बनाने की इस प्रक्रिया में तेज़ी लाने के प्रयोजन से श्री दहिया रेयुकाई की
शिक्षाओं को जन-जन तक पहुंचाने के लिए फ़तेहगढ़ में समय-समय पर सामान्य बैठकें
आयोजित किया करते थे। इन बैठकों के दौरान वे पूरे भारत में अनुसरण किए जा रहे इस
संगठन के प्रमुख लक्ष्यों, उद्देश्यों व गतिविधियों पर चर्चा करते थे।
उस समय मैं आगरा विश्वविद्यालय का छात्र था और छात्र कल्याण संगठन
का प्रमुख था। अन्य युवा राजनैतिक कार्यकर्ताओं की भांति मैं भी श्री सलमान खुरशीद
के साथ सामाजिक व राजनैतिक रूप से जुड़ा था। मेरी मानसिकता अत्याचारी व आक्रामक
प्रवृत्ति की थी। एक दिन श्री दहिया ने मुझसे एक सामान्य बैठक में शामिल होने के
लिए कहा।
आज मैं इस बात को सच्चाई के साथ स्वीकार कर सकता हूं कि उस समय
संगठन से जुड़ने के पश्चात् मुझे इसमें या इसके लक्ष्यों अथवा उद्देश्यों में कोई
रुचि नहीं थी। समय-समय पर गतिविधियां आयोजित की जाती थीं और केवल औपचारिकता पूरी
करने के लिए मैं उन बैठकों में हिस्सा लिया करता था।
एक वर्ष पश्चात् श्री दहिया ने उनके दिल्ली निवास पर आयोजित एक
बैठक में मुझे भी आमंत्रित किया। बैठक में संगठन के कई वरिष्ठ प्रमुख थे जो अपने
निजी अनुभवों को दूसरों के साथ बांट रहे थे और अपनी सीमितताओं एवं भावी योजनाओं के
बारे में चर्चा कर रहे थे। जब मेरी बारी आई तब स्वयं को बड़ा साबित करने और दूसरों
पर छाप छोड़ने के लिए मैं अपने अनुभवों को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से बा रहा था जो
कि सिवाय मिथ्या के और कुछ नहीं था। उपस्थित सज्जनों ने मेरे अनुभवों को सुनकर मेरी
सराहना की। परंतु इस सराहना ने मुझ पर कोई असर नहीं डाला क्योंकि मैं उतना संतुष्ट
एवं प्रसन्न नहीं था जो कि मुझे उस समय होना चाहिए था। मैं अपने झूठे वक्तव्य के
कारण एक ओर मन ही मन अपराध-बोध महसूस कर रहा था। मेरी अंतरात्मा मुझसे कह रही थी कि
मैं इस सराहना के लायक नहीं था।
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उसी समय मेरे मन में एक विचार कौंधा कि जब बिना कुछ किए केवल
अच्छी बातें बोलकर ही मैं लोगों से सराहना एवं सम्मान प्राप्त कर सकता हूँ तब यदि
मैं वास्तव में ही कुछ अच्छा करूं तो मुझे इससे और भी अधिक सराहना, आत्म-संतुष्टि
और सच्ची खुशी प्राप्त होगी। उसी दिन मैंने रेयूकाई की शिक्षाओं का सच्चे दिल से
अभ्यास करने का विनिश्चय किया।
मेरे अभ्यास के दौरान मैंने अपने नकारात्मक रवैये को पहचाना और
सूत्र जाप एवं दूसरों के संग मिचिबिकी के अभ्यास से ऐसे रवैये को हटाने का प्रयास
किया। मैंने अपने कोडोमो के साथ अपनी निजी बैठकें शुरू कीं और आत्म-ध्यान करना शुरू
किया।
इन नए परिवर्तन व विचारों से मेरे कार्य करने के ढंग एवं मेरी
जीवनशैली में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। धीरे-धीरे मैं उस पथ पर चलने लगा जिसके
माध्यम से मैं रेयूकाई के लक्ष्यों व उद्देश्यों को ढूंढ सकता था। मेरे इन नवसृजित
परिवर्तनों ने मेरे मित्रों व साथियों को भी प्रभावित किया। मेरे राजनैतिक व
सामाजिक जीवन एवं गतिविधियों में सकारात्मक परिवर्तन आने लगे। मेरी आर्थिक स्थिति
सुधरने लगी। जहां मेरे पूर्व का आय स्रोत अस्थायी था वहीं सभी के साथ व मनोकामनाओं
से आज मेरे पास अपना स्थायी व स्थिर व्यवसाय है जो कि सुचारू रूप से चल रहा है।
जहां मैं पहले पूर्वजों के बारे में सोचता भी न था, वहीं संगठन के
आध्यात्मिक लक्ष्यों के बारे में ज्ञान प्राप्त करने के बाद अब मैं अपने पूर्वजों
को प्रतिदिन अपना आभार प्रकट करता हूं। मैंने अपने माता-पिता के प्रति आभार व
सम्मान व्यक्त करने के बारे में जाना जिसके कारण आज मेरा अपने परिवारजनों के संग
गहरा व सौहार्द संबंध है। मुझे अपने माता-पिता से नियमित सहयोग व प्रेम मिल रहा है।
मैं संगठन द्वारा आयोजित सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से
हिस्सा ले रहा हूं और इससे मुझे आत्मसंतुष्टि व प्रसन्नता मिल रही है जो कि मेरे
लिए बहुमूल्य है। इन सभी उपलब्धियों से मेरे सामाजिक, आध्यात्मिक व आर्थिक स्तरों
में वृद्धि हुई है। ऐसे क्रमिक व प्रभावी परिवर्तनों के साथ मैंने अपने वर्ष्ठों का
विश्वास जीता है। मेरे ओया श्री दहिया व अन्य वरिष्ठ प्रमुख मेरे लिए नई
ज़िम्मेदारियां नियमित रूप से दे रहे हैं। इस अपरिमित विश्वास व सहयोग के साथ मैंने
दो बार जापान की यात्रा की। वहां पर मेरा अनुभव प्रेरणात्माक एवं स्व-प्रोत्साहक
रहा।
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जापान की मेरी यात्रा के दौरान मुझे रेयूकाई के अभ्यास के बारे में
बहुत से तथ्य स्पष्ट हुए और मैंने नई जानकारियों को अनुभव किया एवं इन के बारे में
ज्ञान प्राप्त किया। जापान में मैंने शाकाडेन एवं मिरोकुसान में अलौकिक अनुभव
प्राप्त किए। मैंने जापान के लोगों के सामान्य जीवनशैली देखी। यहां के लोग मिलनसार
हैं। वे बड़े अच्छे ढंग से अतिथि-सत्कार करते हैं। उनकी जीवनशैली सुनियोजित हैं।
जापानी लोग परिश्रमी हैं, स्वच्छता का ध्यान रखते हैं, प्रकृति के बारे में जागरूक
हैं, तथा शब्दों का दिल से प्रयोग करते हैं व दूसरों के प्रति सच्ची भावना व्यक्त
करते हैं जो दूसरों के लिए स्वतः ही प्रेरणा का स्रोत बन जाता है।
मिरोकुसान में ?नामो-मो-होरेंगे-क्यो?
का लयगत जाप नूतन भाव जागृत करता है जो कि हमारे रवैये को सही करता है। शाकाडेन एवं
मिरोकुसान में अंतर्राष्ट्रीय बैठकों के दौरान सदस्यों ने नम आंखों व शुद्ध हृदय से
अपने अनुभवों को बांटा और एक ऐसा आध्यात्मिक वातावरण हुआ जिसमें अहंकार जैसी
दुष्प्रवृत्तियां दूर हो जाती है और एक मनुष्य का आत्मविश्वास उस स्तर तक पहुंच
जाता है जहां वह समाज के लिए कार्य करने को बोधित हो जाता है और अपने व्यक्तित्व
में परिवर्तन लाने के लिए स्वप्रेरित हो जाता है।
जापान से वापस आने के बाद तथा मेरे ओया व वरिष्ठों से सहयोग व
समर्थन से आज हम फ़तेहगढ़ में चिकित्सा शिविर जैसे स्वास्थ्य जांच, निःशुल्क आंखों
की जांच शिविर, शैक्षिक गतिविधियां जैसे उत्कृष्ठ व निर्धन छात्रों को छात्रवृत्ति,
भाषण प्रतियोगिता, सांस्कृतिक गतिविधियां जैसे नृत्य प्रतियोगिता एवं परिवार दिवस
तथा खेलकूद गतिविधियां जैसे टेबल टेनिस आदि सक्रिय रूप से आयोजित कर रहे हैं। हम
सामान्य जन तक रेयुकाई की सच्ची शिक्षाएं पहुंचाने के लिए नियमित बैठकें भी आयोजित
कर रहे हैं।
रेयूकाई से जुड़े मुझे 14 वर्ष हो गए हैं। अब सारी बातें स्पष्ट
होने लगी हैं। नकारात्मक रवैये का स्थान अब सकारात्मक रवैया ले रहा है। आज मैं उन
लोगों में ही एक हिस्सा बनने का प्रयास कर रहा हूं जो कि नियमित रूप से आंतरिक स्व
विकास की खोज कर रहे हैं, वे लोग जो कि अपने अच्छे कर्मों से मानवीय जीवन को
मूल्यवान बना देते हैं। .
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कृतेसंजय श्रीवास्तव
फ़रूख़ाबाद से
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