एक ओर जहां
सूत्र-पठन हमारे अवचेतन मन के गुप्त सूत्रों को मन की सतह
पर लाने में सहायक होता है जो हमें अपने आसपास की
वास्तविकता को शीघ्र ग्रहण करने वाला बनाता है, वहीं
मिचिबिकी हमें अहसास कराता है कि कैसे ये सूत्र हमारी
क्रियाओं और परस्पर संबंधों पर प्रभाव डालते हैं और उन्हें
सुधारने में हमारी सहायता करता है। जिस प्रकार हम अपनी
स्वयं की आंखों को दर्पण की सहायता के बिना नहीं देख पाते,
उसी प्रकार हमारे मस्तिष्क को भी अपना प्रतिबिंब देखने के
लिये किसी बाहरी तत्त्व की मदद चाहिए। मिचिबिकी द्वारा
हमें बोध होता है कि जिन लोगों से हम परस्पर व्यवहारकरते
हैं व अपनी नकारात्मक व सकारात्मक प्रतिक्रियाओं द्वारा
हमारी दुर्बलताएं व बल प्रतिबिंबित करते हैं।
मिचिबिकी
में हम अपने कार्यों तथा व्यवहार के प्रभाव को दूसरों के
दृष्टिकोण द्वारा परख पाते हैं। जब तक हम अपने दृष्टिकोण
पर दृढ़ रहते हैं हम स्वयं का सूक्ष्म से निरीक्षण नहीं कर
पाते।
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अन्य लोगों
को इस अभ्यास से परिचित करवाने की प्रक्रिया में हम कई
प्रकार से समदृष्टिकोण वाले व्यक्तियों से मिलेंगे, जैसा
कि एक प्रसिद्ध अंग्रेजी कहावत भी है कि
?एक से पंखों वाली जिड़ियां सदैव एक ही झुंड में बैठती हैं?।
जब वो लोग अपनी कोई कमी हमें बताएंगे, तब हमें बोध होगा कि
वह कमी तो हमारे अंदर भी है। क्योंकि दूसरों में कमी अधिक
स्पष्ट दिखाई देती है, इसलिये इन समान कमियों की प्रकृति
और कारण को हम आसानी से समझ सकते हैं। अतः उन्हें सुधारने
की दिशा में एक सार्थक पहल कर सकते हैं। केवल अपने मानसिक
प्रयत्न द्वारा अपनी कमियों पर विजय पाना अत्यंत कठिन है।
फिर भी अपने सदस्यों की कमियों को दूर करने में उनकी
सहायता की प्रक्रिया में स्वतः ही हमें अपनी स्वयं की
कमियों पर विजय पाने की शक्ति मिलती है। यानी जो सक्रिय
प्रयास हमने अपने सदस्यों को उनकी कमियों पर विजय दिलाने
को मूलरूप से किये, वही हमारे दृष्टिकोण में सकारात्मक
परिवर्तन लाते हैं; और ऐसे प्रयास
की निरंतरता इस सकारात्मक दृष्टिकोण को हमारे स्वभाव का एक
हिस्सा बना देती है।
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