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क्रिया
 

अपने अंतर्मन की प्रकृति में परिवर्तन लाने के लिये उसे समझना मात्र काफ़ी नहीं। इसके लिये आवश्यकता है लगन, दृढ़ निश्चय तथा असीम सकारात्मक इच्छा शक्ति की। जब तक हमारे अहँ की आत्मकेंद्रित प्रकृति हमें केवल अपनी समस्याओं के बारे में चिंतित कर सबसे पृथक रखेगी तब तक यह आत्मकेंद्रिता हमारे व्यवहार पर नकारात्मक प्रभाव डालते हुए सशक्त होती जाएगी। इस प्रवृति को जीतने के लिये रेयूकाई हमें एक सशक्त सकारात्मक इच्छाशक्ति का निर्माण करने में सहायक होती है, जिससे परव्यवहार में हम मनचाहा परिवर्तन ला सकें। इसे प्राप्त करने के लिये सर्वप्रथम हमें अपनी मूल प्रकृति में परिवर्तन लाना होगा और केवल अपने ही बारे में सोचने के स्थान पर दूसरों के हित के बारे में सोचने की पूरी ईमानदारी से कोशिश करनी होगी। इस परिवर्तन को लाने के लिये सर्वप्रथम हमें ?नील सूत्र? का पाठ करते हुए अपने मस्तिष्क को नव-विचारग्रहण हेतु खुला रखना होगा। इस नियमित सूत्र पाठ से एक ऐसी अनोखी अनुभूति उत्पन्न होगी जिससे हम स्वयं ही आस-पास के समस्त चर-अचर जीवों एवं वस्तुओं के हित के बारे में भी सोचने लगेंगे, क्योंकि अस्तित्व के परस्पर संबंधित संजाल में प्रत्येक एक निहित अपरिवर्तनीय प्रायोजन हेतु है। अपने व्यवहार में परोपकारी दृष्टिकोण का विकास कर पाना ही आत्मविकास तथा रेयूकाई अभ्यास का एक अहम् हिस्सा है।

दृढ़ निश्चय एवं समस्त संसार के हित की परिकल्पना करते हुए ?कमल सूत्र? का नियमित पाठ एक ऐसी परोपकारी शक्ति का धीरे धीरे विकास करता है जो हमारे भीतर के अहँकार एवं आत्मकेंद्रित रहने की प्रवृत्ति का विरोध करती है। हमारा प्रत्येक प्रयास हमें अपने अंदर कुछ सुधार का अहसास देगा जिससे सकारात्मक आत्मसंतुष्टि की अनुभूति होगी - ऐसी अनुभूति स्वयं हमें व हमारे व्यवहार से आस-पास के व्यक्ति को महसूस होगी। वह हमारे नए व्यवहार को देखेंगे व प्रक्रिया करेंगे और उन द्वारा अनुभव किये परिवर्तन को हमें बताएंगे, हमें प्रमाण देते हुए कि सुधार प्रक्रिया काम कर रही है, साथ ही हमें प्रक्रिया जारी रखने की प्रेरणा देंगे। इस प्रकार हमारे आसपास के लोग समारे सुधार के प्रयास का एक प्रमुख अंग बन जाते हैं तथा इसी प्रकार इस अभ्यास को दूसरों के साथ बांटने की प्रक्रिया आरंभ होती है।




 

   


रेयुकाई इंडिया जापानी भाषा स्कूल


गुरगांव (इंडिया) में निःशुल्क जापानी भाषा कक्षाएं आयोजित की जाती हैं

विवरण सूची एवं पाठ्यक्रम की जानकारी

वर्कशाप

आध्यात्मिक सहचर्या संस्था अपने सदस्यों के लिए विभिन्न कार्यशालाएं आयोजित करती है


 






सामान्य बैठकें गया

मार्गदर्शन या मिचिबिकी के द्वारा ना केवल हम अपने आसपास के लोगों को लाभ पहुँचाने का कार्य करते हैं बल्कि स्वयं अपने विकास की दिशा में भी कार्य करते हैं। ना केवल अपने मित्रों बल्कि सदस्यों को भी ऋ वे लोग जिन्हें हमने रेयूकाई से परिचित कराया है - हम प्रमाणित कर सकते हैं कि किस प्रकार ?पूर्वज प्रतीक? तथा कमल सूत्र के द्वारा अपने अंतर्मन में झांककर हम उसे आलोकित कर सकते हैं। उन्हें रेयूकाई से परिचित कराकर हम उनके प्रति अपनी मूल व्यवहार में परिवर्तन ला सकते हैं।

एक ओर जहां सूत्र-पठन हमारे अवचेतन मन के गुप्त सूत्रों को मन की सतह पर लाने में सहायक होता है जो हमें अपने आसपास की वास्तविकता को शीघ्र ग्रहण करने वाला बनाता है, वहीं मिचिबिकी हमें अहसास कराता है कि कैसे ये सूत्र हमारी क्रियाओं और परस्पर संबंधों पर प्रभाव डालते हैं और उन्हें सुधारने में हमारी सहायता करता है। जिस प्रकार हम अपनी स्वयं की आंखों को दर्पण की सहायता के बिना नहीं देख पाते, उसी प्रकार हमारे मस्तिष्क को भी अपना प्रतिबिंब देखने के लिये किसी बाहरी तत्त्व की मदद चाहिए। मिचिबिकी द्वारा हमें बोध होता है कि जिन लोगों से हम परस्पर व्यवहारकरते हैं व अपनी नकारात्मक व सकारात्मक प्रतिक्रियाओं द्वारा हमारी दुर्बलताएं व बल प्रतिबिंबित करते हैं।

मिचिबिकी में हम अपने कार्यों तथा व्यवहार के प्रभाव को दूसरों के दृष्टिकोण द्वारा परख पाते हैं। जब तक हम अपने दृष्टिकोण पर दृढ़ रहते हैं हम स्वयं का सूक्ष्म से निरीक्षण नहीं कर पाते।
 




' हम एक है ' पत्रिक

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अन्य लोगों को इस अभ्यास से परिचित करवाने की प्रक्रिया में हम कई प्रकार से समदृष्टिकोण वाले व्यक्तियों से मिलेंगे, जैसा कि एक प्रसिद्ध अंग्रेजी कहावत भी है कि ?एक से पंखों वाली जिड़ियां सदैव एक ही झुंड में बैठती हैं?। जब वो लोग अपनी कोई कमी हमें बताएंगे, तब हमें बोध होगा कि वह कमी तो हमारे अंदर भी है। क्योंकि दूसरों में कमी अधिक स्पष्ट दिखाई देती है, इसलिये इन समान कमियों की प्रकृति और कारण को हम आसानी से समझ सकते हैं।

 
 

अतः उन्हें सुधारने की दिशा में एक सार्थक पहल कर सकते हैं। केवल अपने मानसिक प्रयत्न द्वारा अपनी कमियों पर विजय पाना अत्यंत कठिन है। फिर भी अपने सदस्यों की कमियों को दूर करने में उनकी सहायता की प्रक्रिया में स्वतः ही हमें अपनी स्वयं की कमियों पर विजय पाने की शक्ति मिलती है। यानी जो सक्रिय प्रयास हमने अपने सदस्यों को उनकी कमियों पर विजय दिलाने को मूलरूप से किये, वही हमारे दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तन लाते हैं; और ऐसे प्रयास की निरंतरता इस सकारात्मक दृष्टिकोण को हमारे स्वभाव का एक हिस्सा बना देती है।

 

 
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: रेयुकाई जीवनशैली से बढ़कर और भी कुछ है । :

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